जीवन उद्देश्य

*श्री कृष्ण द्वारा उल्लेखित जीवन उद्देश्य*

जीवन एक व्यापक विषय है.

हमारे जन्म लेने से बड़े होने, पढ़ने और फिर कमाने के कोलाहल के दौरान हम अक्सर यह प्रश्न पूछते हैं की ‘जीवन का उद्देश्य क्या है?’. अक्सर प्रतीत होता है की एक शिक्षित व्यक्ति का हर कार्यकलाप इसी प्रश्न के इर्द गिर्द घूमता है.
‘उद्देश्य’ प्रमित है, प्रमुख है. जीवन जीव की जागृत मात्र अवस्था है.

अगर कोई एक चीज़ मानव को और अन्य जीवों से अलग करती है तो वह है उद्देश्य बोध.
हमारे आसपास जो भी विलक्षण हुआ, प्रभावी हुआ, विस्म्रित्कारी हुआ, बदलाव हुआ, वह एक व्यक्ति के विशुद्ध उद्देश्य बोध का परिणाम है.

अगर हम गौर करें तो किसी भी धर्म, सम्प्रदाय और दर्शन का बीजमूल ‘उद्देश्य’ की व्याख्या मात्र है. धर्म हमारे जीवन उद्देश्य को परिभाषित करते हैं. यह परिभाषा हम बचपन से हमारे परिवार, समाज और गुरुजनों से भी ग्रहण करते हैं. परिभाषा जो फिर कर्तव्य का रूप ले लेती है. 12वीं कक्षा तक सब कुछ अच्छे अंक लाना मात्र है, फिर किसी प्रतियोगी स्पर्धा में पास होना और फिर एक समृद्ध और प्रसिद्ध जीवन? 35 के पार होते होते हमें पता चलता है की सुख असली उद्देश्य है, 40 के पार होते होते शांति उद्देश्य लगने लगती है.

*उद्देश्य क्या होना चाहिए?*

ब्रह्मांड को सीमांकित करने वाले; शब्द, भाषा, जीवन यापन, समाज, दिनचर्या, कर्तव्य, विज्ञान, अर्थ और अंतरमन को रेखांकित करने वाले, सनातन सत्य ‘वेद’ हमें इसका संकेत देते हैं. *भगवान श्री कृष्ण ने वेदों के सार को भगवद्गीता में संचयित किया है.*

तदनानुसार, एक मानव का उद्देश्य है धर्म की स्थापना, अर्थ का अर्जन और सही उपयोग, काम का संयम, और अंततः मोक्ष.

….धर्म का कोई स्वरूपात्मक शब्द english में नहीं है. धर्म religion नहीं है. धर्म, सत्य और न्याय परिणयता को साधना है. ऐसा सत्य जो सनातन हो. जो ब्रह्माण्ड के हर कोने में सत्य स्वरुप ही रहे. बड़ो का सम्मान, दूसरों की मदद, स्नेह, मर्म, दया, दान, श्रमदान, क्षमा, समाजोपयोगी नियमों की रक्षा, इत्यादि.

…अर्थ मात्र money नहीं है. अर्थ है अच्छा ज्ञान, स्वास्थ्य, संतुष्ठी, और लक्ष्मी के आनंदमयी कल्याणमयी स्वरुप को साधना और इसको धर्मोपयोगी काम में व्यय करना.

… काम का अर्थ मात्र प्रचलित यौन क्रिया नहीं है. काम सभी इन्द्रियों को संतुष्ट करने वाली वस्तुओं और अनुभवों को धर्म और आश्रम के अनुसार पार करने का नाम है. तामसी भोजन, विलासिता, दिखावा आदि काम का संदोष स्वरुप हैं, इन्हें पार पाना उद्देश्य है

… और यह सब करके अंततः मोक्ष प्राप्त करना हमारा परम उद्देश्य. मोक्ष मतलब heaven नहीं, अपितु यह अंतिम पड़ाव है. जहाँ आप परमात्मा में विलीन हैं और अब आप जन्म मृत्यु से परे हैं. आपने मनुष्य जीवन को अपने कर्मो द्वारा साध लिया है. आपकी आत्मा अब अपने मूल स्वरुप परमात्मा में विलीन हो चुकी है और आप परमानंद को प्राप्त कर चुके हैं.

गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यही सब बतलाते हैं.

कुरुक्षेत्र को अपना अंतर्मन जानें. भीष्म, दुर्योधन, दुसाशन, द्रोण और अश्व्थामा को मोह, अहंकार, लोभ, क्रोध और काम जानें. अर्जुन को आपका चेतन मन .
आपका मन बरबस इन अवगुणो से युद्ध में सलग्न है. पर वह कायर है, कमज़ोर है, भ्रमित है.
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार उसे अपने से प्रतीत होते हैं. उनसे चलने वाला यह युद्ध उसे अनावश्यक लगता है. माया वशीभूत होकर इन दुर्गुणों की हार में मन अपनी हार ढूँढने लगता है.
ऐसे में आत्मा स्वरुप भगवन श्री कृष्ण कहते हैं की अर्जुन अगर तू धर्म के मार्ग पे प्रशस्त है तो डर काहे का? अगर तेरी भावना सही है, पथ सही है और तू इसपर अग्रसर है तो फिर तुझे भय कैसा?

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

हे कुन्तीपुत्र! यदि तू युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा और यदि तू युद्ध जीत गया तो पृथ्वी का साम्राज्य भोगेगा, अत: तू दृढ-संकल्प करके खड़ा हो जा और युद्ध कर।

बस यही तत्व है गीता का. अगर हम धर्म के मार्ग पे प्रशस्त हैं तो कोई असम्मान, कोई प्रतिकार, कोई अत्याचार, कोई हथियार हमे डरा नहीं सकता. हम हार गए तो परलोक और जीत गए तो त्रिलोक विजयी बनेंगे.

इसी जीवन उद्देश्य के बोध को हम ‘चेतना’ कहते हैं.
व्यक्तिगत चेतना कल्याण स्वरुप है, मगर जन चेतना परमकल्याण है. धर्म स्थापना परम कर्तव्य है. इसमें सहभागिता बढ़ाना और अधर्म का नाश करना आवश्यक है.
धर्म परायणता में व्यक्ति स्वयं सबसे छोटी इकाई है.
सबसे ऊपर देश है, फिर नगर, फिर समाज, फिर कुनबा, फिर परिवार और फिर स्वयं. स्वयं की स्वार्थ साधना मोक्ष से दूर ले जाती है. सहज और निस्वार्थ सेवा सर्वोपरि है.

धर्म मार्ग पर हम हार गए तो परलोक और जीत गए तो त्रिलोक विजयी करेंगे.

~ विनय मंगल
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Vinay Mangal

Dharma and Disha