भारत का दुर्भाग्य – India’s misfortune

by Vinay Mangal

दुर्भाग्य भाग्य की अनुपस्थिति नहीं है अपितु बहुत प्रयास के पश्चात भी हाथ कुछ न लगने वाली स्थिति है।

भारत को अब यह निरर्थक और भ्रमित प्रयास करते कई शताब्दी बीत गयीं है। यह एक जीवित रहने और अपनी पहचान बचाने की लड़ाई है। भारत जो विश्व की सबसे परिपूर्ण सभ्यता का जनक था, आज कई हिस्सों में बांटा जा चुका है।

भारत के लोगों को पहले ज्ञात तो था की वह परतंत्र हो गए हैं परंतु 1947 के पश्चात् और कागज़ के कुछ पन्नों पे लिखे अंग्रेज़ी दस्तावेज़, जिन्हें हम संविधान कहते हैं, को पढ़, हम को लगने लगा की हम ‘स्वतंत्र’ हैं। यह पराधीनता ज्यादा भयावह थी। हमारा कारागार वही रहा सिर्फ दरबान बदल दिए गए।

आज़ाद कहलाने वाला भारत कहीं से भी हमारी सभ्यता और सोच का परिचायक नहीं था। हमारे साथ हुए दुष्कर्मों का कभी कोई हिसाब नहीं हुआ। यही नहीं, जिस समाज ने हज़ारों साल भयानक से भयानक यंत्रणाएँ झेली, उसी समाज को चालाकी से हमेशा अपराध बोध में रखा गया। इतिहास को तोड़ मरोड़ के बदल दिया गया। जिस समाज की क्षतिपूर्ति होनी चाहिए थी, ‘संविधान’ ने उसे बड़े भाई की तरह ज़िम्मेदारियों से लाद दिया।

देश की सीमा के बाहर और अंदर जो हो रहा है, हम सब उसके साक्षी हैं।
हम आज से नहीं.. पिछली कई सदियों से.. पिछले अनेको अनेक जन्मों से निष्क्रिय हैं। हमारे अवचेतन मन में भविष्य और कुल की सुरक्षा का भाव इतना अगाढ़ हो गया है कि हम प्रतिक्रिया को पाप मान बैठे हैं।

एक ऐसी सभ्यता जहाँ लक्ष्मी, सुख और सौहार्द के साथ शस्त्र सज्जित मानव रूपी देवताओं को पूजा गया हो, तो इस निष्क्रियता की क्या वजह है? हमने ये कब मान लिया की शास्त्र बिना शस्त्र के जनउपयोगी होंगे?

पहले हमने अपने सनातन सामाजिक और राजनैतिक सिद्धान्तों को एक ऐसे अनुपयुक्त और अव्यवहारिक संप्रदाय के नियमों पर बलिदान कर दिया जहाँ ‘अहिंसा’ को ही मानवता का अंतिम उद्देश्य स्थापित कर रखा था। ऐसा करने से न सिर्फ हमने अपना क्षत्रिय भाव समाप्त कर लिया अपितु इस सबसे पैदा हुई भ्रान्ति ने हमें खोखला कर दिया। अफगानिस्तान से इंडोनेशिया तक फैले साम्राज्य को छिन्न भिन्न कर लिया।

“अहिंसा परमो धर्म “
(अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है) मंत्र को भांग की तरह घोट कर हमने इस देव भूमि के साथ अपराध किया।

कई मन्वन्तर और लाखों साल से इस विश्व विजयी और विश्व ज्ञान गंगा को हमने निशस्त्र करके निश्चित पराजय और पृथकता के रास्ते पे धकेल दिया।

Parshuram Ji. The Kshatriya Monk

मोहम्मद बिन कासिम का जब भारत के पश्चमी भूभाग पे आगाज़ हुआ तो वहां के लोग उसे अदम्य चुनौती की बजाय गाजर मूली प्रतीत हुए। एलेक्जेंडर जैसी विश्व शक्ति को न सिर्फ हराकर बल्कि शर्मिंदा करके भेजने वाले भूभाग को ‘अहिंसा’ ने अंततः पराजित कर दिया।
मोहम्मद गोरी का सामना जब शूरवीर चौहान से हुआ तो इनकी सहृदयता के चलते ये भूभाग भी पश्चिमी लूटरों के हत्ते चढ़ गया।
जो लोग तलवार की नोंक से जीवित बचे, फिर शुरू हुआ उनका ISIS नुमा कुल 1200 सालों का शोषण और तिरिस्कार।

जज़िया और इसके जैसे हज़ारों साधनों से भारतीय मूल के लोगों का आत्मसम्मान तोड़ा गया। यह वह भारतीय थे जिनका सौहार्द और गर्व तो बहुत पहले मंदिरों और मूर्तियों के साथ तोड़ दिया गया था।
जब इस वर्ग ने एकजूट होके सर उठाना चाहा तो नादिर शाह जैसे लूटेरों ने इनके नरमुंडों से चौराहे भर दिए और हिन्दू’कुश’ से लेजाकर लाखों की संख्या में इनको जानवरों की तरह अरविस्तान में बेचा गया।
औरंगजेब ने बचे खुचे भूभाग और इसकी आत्मा पे सनातन के अंतिम चिन्हों को भी अधिकाँश रूप से नेस्तनाबूत कर दिया।

फिर अंग्रेज आये। वह काम जो मुगल और तुरकी लूटेरों ने 1200 साल में किया, इन्होंने उससे बहुत व्यापक और गहरा गढ्ढा 100 साल में ही खोद डाला। इन्होंने तो भारत की जड़ों में ही मठ्ठा डाल दिया। अंग्रेज़ो ने न सिर्फ हमें एक पिछड़े और अनैतिक असामाजिक भूमि करार कर दिया अपितु मैकॉले द्वारा भूरे अँगरेज़ ग़ुलामों की एक पूरी जाती को इसका सिरमौर बना दिया। हमारे ज्ञान और विज्ञान को अंग्रेजी चोला पहना के हमें ही ‘इम्पोर्ट’ कर दिया गया।

इस पुरे इतिहास का संक्षिप्त वर्णन इस लेख के लिए जरुरी था। हमें पता होना चाहिए की एक देश, एक वर्ग और एक अटूट सभ्यता के पिरोधा होने के बावजूद हममें ये निष्क्रियता या अप्रतिदत क्षमा का भाव कहाँ से आया।
राम और कृष्ण के वंशज कब अपनी कायरता और भीरूपन को अलंकार और गुण स्वरुप पहनने लगे।

1200 सालों के अत्याचार ने एक भारतीय को आत्म और कुल संरक्षण के अपरिहार्य स्वभाव से इतना जड़ कर दिया है कि हमें अपनी रक्षा का एकमात्र साधन विनीत और सरल होना लगता है। पूर्वजों द्वारा ‘देर है अंधेर नहीं’ आदि लोकक्ति ने हमें खड़े होकर लड़ने के स्वाभाव से कोसों दूर कर दिया है। हम भूल गए हैं कि हम विश्व भारती के द्योतक थे। हमें अपने ज्ञान अपनी बुद्धिमता अपनी धर्म सरक्षणा के भाव पे शक है।

तो आज जो भारत की सीमा और उसके अंदर हो रहा है इसे इन कई सौ सालों की पैदावार जानें। हम पर हमले होते रहेंगे, हमे यूँही पाश्चात्य और अप्राकृतिक मूल्यों में बाँध के रखा जाएगा।

Chhatrapati Shivaji

अगर हम जवाबी हमला करेंगे भी तो क्षमा टोली हमें आक्रमणकारी का दर्ज़ा देके ‘अहिंसा परमो धर्म’ का चोला पहना देगी। मैकॉले के भूरे सिपाही हमसे सबूत मांगेंगे। धर्म के विवेकानंद स्वरुप की पालना करने वाले देश के तत्कालीन शासक का परिहास करेंगे।

हम आज में लौटें और देखें हमारे आस पास क्या जो रहा है? हम अपने पूर्वजों से बहुत दूर हो गए हैं। हमें हमारी सभ्यता का अंदाज़ा भी नहीं है। हम हर रूप से पाश्चात्य हैं। हमारी भाषा, खानपान, हमारे घर, हमारे त्योहार, हमारे ऑफिस, हमारे जीवन उद्देश्य, हमारी नैतिकता, हमारा सब कुछ पाश्चात्य है। भारत से इसका कोई सरोकार नहीं है।

हमें ना अपनी पहचान का बोध है और ना अपने शत्रु की सोच की कोई भनक। हम शुतुरमुर्ग की भांति धरती में सर छुपा के अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं।

हमें संज्ञान ही नहीं हम क्या थे और क्या हो सकते थे।

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Vinay Mangal

Dharma and Disha